September 21, 2026

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उत्तराखंड में बारिश से ‘अन्नदाताओं’ को भारी नुकसान, 41 हेक्टेयर फसल बर्बाद, रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

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कृषि विभाग ने उत्तराखंड में बारिश से खराब हुई फसल का डाटा जारी किया. इसमें चंपावत जिला सबसे ज्यादा प्रभावित है. रिपोर्ट-नवीन उनियाल

देहरादून: उत्तराखंड में बारिश और आपदा से फसलों को हुए नुकसान का कृषि विभाग का ताजा आंकड़ा सामने आया है. रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदेश में 41.908 हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ है. इसमें 33 प्रतिशत से कम और 33 प्रतिशत से अधिक फसल क्षति वाले क्षेत्र के साथ फसल के पूरी तरह प्रभावित होने के मामले भी दर्ज हैं. रिपोर्ट में धान, मंडुवा, झंगोरा, मक्का, गेहूं, सब्जियों और अन्य फसलों को हुए नुकसान का ब्यौरा है. फसलों के नुकसान के मामले में चंपावत जिला सबसे आगे रहा है. ऐसे में बारिश और आपदा ने किस फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया और कहां किसको सबसे ज्यादा मार झेलनी पड़ी. ये रिपोर्ट पढ़िए.

उत्तराखंड में इस बार मॉनसून का सीजन किसानों के लिए मुश्किल भरा रहा. लगातार बारिश, कई जगह अत्यधिक बारिश और खेतों में जलभराव के बीच खरीफ की फसलों को नुकसान पहुंचा है. अब जबकि 15 सितंबर के बाद मॉनसून की वापसी का दौर शुरू हो जाता है, तो कृषि निदेशालय की रिपोर्ट ने बारिश से हुए फसल नुकसान की तस्वीर सामने रखी है. रिपोर्ट के मुताबिक,

‘प्रदेश में अब तक (1 जून से 17 सितंबर तक) कुल 41.908 हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई है. सबसे ज्यादा नुकसान चंपावत जिले में 27.390 हेक्टेयर दर्ज किया गया है. यानी प्रदेश में दर्ज कुल प्रभावित क्षेत्र का करीब दो-तिहाई हिस्सा अकेले चंपावत जिले में है’.

चंपावत में सबसे ज्यादा नुकसान, 27.390 हेक्टेयर फसल प्रभावित: जिला स्तर पर देखें तो चंपावत सबसे ज्यादा प्रभावित जिला है. यहां कुल 27.390 हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई है. चंपावत क्षेत्र में 16.050 हेक्टेयर, पाटी में 7.950 हेक्टेयर, बाराकोट में 2.850 हेक्टेयर और लोहाघाट में 0.540 हेक्टेयर फसल प्रभावित होने का आंकड़ा दर्ज है. इन चारों क्षेत्रों को जोड़ने पर चंपावत का कुल नुकसान 27.390 हेक्टेयर बैठता है.

चंपावत की स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अकेले इस जिले का प्रभावित क्षेत्र प्रदेश के कुल 41.908 हेक्टेयर नुकसान में सबसे बड़ा हिस्सा है. रिपोर्ट में इन क्षेत्रों में प्रभावित फसल को लेकर अलग-अलग क्षति श्रेणियां भी दर्ज किया गया है. खास बात यह है कि चंपावत मुख्यमंत्री का भी विधानसभा क्षेत्र है.

रुद्रप्रयाग दूसरे बड़े प्रभावित जिलों में, 5.105 हेक्टेयर नुकसान: रुद्रप्रयाग जिले में कुल 5.105 हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई है. यहां ऊखीमठ क्षेत्र में कई प्रविष्टियों यानी मलबा आना और भूमि कटाव के माध्यम से नुकसान दर्ज किया गया है. इनमें खलियान में 2.000 हेक्टेयर, पौंधी में 0.150 हेक्टेयर, लिस्वाल्टा में 0.110 हेक्टेयर, धारकुड़ी में 0.265 हेक्टेयर, पुजारगांव में 1.000 हेक्टेयर, किमाणा में 1.200 हेक्टेयर और रायड़ी में 0.380 हेक्टेयर प्रभावित क्षेत्र शामिल है.

इन सभी आंकड़ों को जोड़ने पर रुद्रप्रयाग का कुल प्रभावित क्षेत्र 5.105 हेक्टेयर होता है. रिपोर्ट में यहां मंडुवा समेत पहाड़ी क्षेत्रों में उगाई जाने वाली अलग-अलग फसलों पर असर दर्ज किया गया है. इसका मतलब है कि नुकसान किसी एक फसल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्थानीय खरीफ फसलों पर भी मौसम की मार पड़ी है.

नैनीताल में 5 हेक्टेयर प्रभावित, एक ही क्षेत्र में बड़ा नुकसान: नैनीताल जिले में कुल 5.000 हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई है. रिपोर्ट में ओखलकांडा क्षेत्र से नुकसान दर्ज किया गया है. यहां प्रभावित फसलों में मक्का, मंडुवा, फलदार फसल, सब्जी, मोटा अनाज समेत अन्य फसलों का उल्लेख है.

नैनीताल का आंकड़ा भी प्रदेश के कुल नुकसान में बड़ा हिस्सा रखता है. खास बात यह है कि जिले में दर्ज 5 हेक्टेयर नुकसान एक ही प्रमुख क्षेत्रीय प्रविष्टि में सामने आया है.

उत्तरकाशी में 3.55 हेक्टेयर, नौगांव-मोरी तक असर: उत्तरकाशी जिले में कुल 3.550 हेक्टेयर फसल प्रभावित होने का आंकड़ा है. इसमें नौगांव क्षेत्र में 1.200 हेक्टेयर और दूसरी प्रविष्टि में 0.750 हेक्टेयर, डुंडा में 0.400 हेक्टेयर और मोरी में 1.200 हेक्टेयर फसल प्रभावित दर्ज की गई है.

इस तरह उत्तरकाशी में भी नुकसान कई क्षेत्रों में फैला हुआ है. रिपोर्ट में मंडुवा समेत पहाड़ी फसलों का उल्लेख किया गया है.

अल्मोड़ा में 0.59 हेक्टेयर, छोटे क्षेत्रों में बंटा नुकसान: अल्मोड़ा में कुल प्रभावित क्षेत्र 0.590 हेक्टेयर है. इसमें चौखुटिया में 0.430 हेक्टेयर, जिसमें दूसरी प्रविष्टि में 0.208 और 0.012 हेक्टेयर शामिल है. इसके अलावा ताकुला क्षेत्र में 0.030 हेक्टेयर जिसमें दूसरी प्रविष्टि में 0.02 हेक्टेयर शामिल है. इसी में आगे डिगरा में 0.030 और आगरा रोखाकुड़ी में 0.010 हेक्टेयर नुकसान दर्ज है. वहीं हवलबाग में 0.090 हेक्टेयर फसल भूमि का नुकसान दर्ज किया गया है.

चमोली में 0.14 हेक्टेयर, हरिद्वार में 0.133 हेक्टेयर: चमोली जिले में 0.140 हेक्टेयर फसल प्रभावित होने का आंकड़ा दर्ज है. नंदानगर क्षेत्र की इस प्रविष्टि में 0.08 और 0.06 हेक्टेयर की क्षति श्रेणियां दर्ज हैं.

हरिद्वार में 0.133 हेक्टेयर प्रभावित क्षेत्र दर्ज किया गया है. इसके अलावा देहरादून, पिथौरागढ़, पौड़ी और टिहरी में इस रिपोर्ट के अनुसार प्रभावित क्षेत्र 0.000 हेक्टेयर दर्ज है.

कुल नुकसान में 33 प्रतिशत से ज्यादा क्षति का बड़ा हिस्सा: रिपोर्ट में कुल 41.908 हेक्टेयर प्रभावित क्षेत्र दर्ज है. इसमें 0.4580 हेक्टेयर क्षेत्र 33 प्रतिशत से कम फसल क्षति की श्रेणी में है, जबकि 31.791 हेक्टेयर क्षेत्र में 33 प्रतिशत से अधिक फसल क्षति दर्ज की गई है. इसके अलावा रिपोर्ट में 6.8398 हेक्टेयर, 0.3510 हेक्टेयर, 5.723 हेक्टेयर और 1.042 हेक्टेयर के अलग-अलग क्षति/प्रभावित क्षेत्र के आंकड़े भी दर्ज हैं.

यहां सबसे अहम बात यह है कि 31.791 हेक्टेयर का आंकड़ा अकेले 33 प्रतिशत से अधिक फसल क्षति वाली श्रेणी का है. इसे कुल नुकसान मानना सही नहीं होगा. कुल प्रभावित क्षेत्र रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से 41.908 हेक्टेयर दिया गया है.

मॉनसून की विदाई, लेकिन किसानों की चिंता बरकरार: मॉनसून की वापसी का समय शुरू होने के बावजूद इस सीजन में बारिश से हुए नुकसान ने किसानों की मुश्किलें बढ़ाई हैं. खासकर चंपावत जैसे जिलों में नुकसान का बड़ा हिस्सा दर्ज होना बताता है कि मौसम का असर सभी क्षेत्रों में एक जैसा नहीं रहा. कहीं नुकसान शून्य दर्ज हुआ तो कहीं कई हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई.

कृषि निदेशालय की रिपोर्ट फिलहाल दर्ज नुकसान की तस्वीर सामने रखती है. मॉनसून की वापसी के दौरान अगर आगे भी बारिश होती है तो प्रभावित क्षेत्र का आंकड़ा बदल सकता है. ऐसे में इस सीजन का अंतिम आकलन किसानों की वास्तविक क्षति की तस्वीर को और स्पष्ट करेगा. फिलहाल सरकारी रिकॉर्ड में 41.908 हेक्टेयर कुल प्रभावित क्षेत्र और 27.390 हेक्टेयर के साथ चंपावत सबसे ज्यादा प्रभावित जिला है.

फसलों को हुए नुकसान की रिपोर्ट मांगी गई थी और जो किसान इससे प्रभावित हुए हैं, उन्हें राहत देने का भी प्रयास किया जा रहा है.
-गणेश जोशी, कृषि मंत्री-

उधर, दूसरी तरफ इस मामले में किसानों का कहना है कि सरकार को आपदा मद में भी किसानों को ही सबसे पहले प्राथमिकता देनी चाहिए.

जिस तरह से पर्वतीय क्षेत्र के किसानों को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, उसके चलते किसानों को फौरन राहत दी जानी चाहिए, क्योंकि किसान भी कर्ज लेकर खेती करता है. ऐसे में यदि उन्हें समय पर पैसा नहीं मिलेगा तो उनकी दिक्कतें बढ़ सकती है.
-दीपक करगेती, महासचिव, पर्वतीय कृषक कृषि बागवानी और उद्यमी संगठन-

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