August 18, 2026

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हरीश रावत पर हमलावर हुए पुराने साथी, इतिहास से लेकर उम्र तक दिलाई याद

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हरीश रावत पार्टी में अपने दबदबे को कायम नहीं रख पा रहे हैं, उनके करीबी रहने वाले पुराने साथी उन पर निशाना साध रहे हैं.

देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बयान ने हलचल तेज कर दी है. कांग्रेस के भीतर लंबे समय तक पावर सेंटर रहे हरीश रावत अब 2017 की हार का बदला लेने की बात कह रहे हैं. उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब राज्य में कांग्रेस लगातार दो विधानसभा चुनाव हार चुकी है और पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं.

दरअसल 2017 का विधानसभा चुनाव उत्तराखंड कांग्रेस के लिए बेहद खराब साबित हुआ था. उस समय हरीश रावत के नेतृत्व में पार्टी को भारी दल-बदल का सामना करना पड़ा था और अंततः कांग्रेस को करारी हार झेलनी पड़ी. यही वजह है कि रावत इस हार को राजनीतिक रूप से सबसे बड़ी चोट मानते हैं. हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन अपने हालिया बयान में हरीश रावत ने उस हार का जिक्र नहीं किया.

इससे यह संकेत मिलता है कि वह 2017 की परिस्थितियों को ज्यादा गंभीर और असाधारण मानते हैं.हरीश रावत के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया है. खास बात यह है कि सिर्फ विपक्ष ही नहीं, बल्कि उनके पुराने सहयोगी और कभी करीबी रहे नेता भी अब उनके खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं.

जब तक हरीश रावत राजनीति में सक्रिय हैं, तब तक उत्तराखंड में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की कोई संभावना नहीं है. हरीश रावत की कार्यशैली ने कई नेताओं के राजनीतिक करियर को नुकसान पहुंचाया है.
किशोर उपाध्याय, भाजपा विधायक

यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि किशोर उपाध्याय कभी हरीश रावत के सबसे करीबी नेताओं में गिने जाते थे. रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान उपाध्याय के पास संगठन की बड़ी जिम्मेदारी थी और दोनों के बीच मजबूत राजनीतिक तालमेल देखने को मिलता था. लेकिन समय के साथ दोनों के रिश्तों में दरार आई और अब वही उपाध्याय उनके सबसे मुखर आलोचकों में शामिल हो गए हैं. सिर्फ किशोर उपाध्याय ही नहीं, बल्कि कई अन्य नेता भी हैं जो कभी हरीश रावत के राजनीतिक सहयोगी रहे, लेकिन अब उनसे दूरी बना चुके हैं. यह सिलसिला कांग्रेस के भीतर रावत की कमजोर होती पकड़ की ओर इशारा करता है. पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर खींचतान और गुटबाजी की चर्चा लंबे समय से होती रही है, और रावत का हालिया बयान इस बहस को और हवा दे रहा है.

हरीश रावत की जिद एक बच्चे की जिद की तरह है. हरीश रावत अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां उनके लिए सक्रिय राजनीति में ज्यादा संभावनाएं नहीं बची हैं. वो राजनीति के खोखला कारतूस हैं और अब न तो उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक जमीन बची है और न ही कांग्रेस के लिए कोई ठोस भविष्य नजर आता है.
सुबोध उनियाल कैबिनेट मंत्री

भाजपा की ओर से इस तरह के बयान यह दर्शाते हैं कि विपक्ष रावत के बयान को कांग्रेस की कमजोरी के रूप में भुनाने की कोशिश कर रहा है. हालांकि कांग्रेस के भीतर सभी नेता इस तरह की आलोचना से सहमत नहीं हैं.

राजनीति में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होती. समय के साथ परिस्थितियां बदलती हैं और कई बार ऐसे नेता भी वापसी कर लेते हैं जिन्हें राजनीतिक रूप से खत्म मान लिया गया हो.
सूर्यकांत धस्माना कांग्रेस नेता

सूर्यकांत धस्माना का यह बयान कांग्रेस के भीतर उस वर्ग की सोच को दर्शाता है जो अभी भी हरीश रावत के अनुभव और राजनीतिक पकड़ को महत्वपूर्ण मानता है. हालांकि यह भी सच है कि पार्टी के भीतर उनके विरोधियों की संख्या लगातार बढ़ती दिख रही है. रंजीत रावत जैसे नेता पहले ही कई मौकों पर हरीश रावत के खिलाफ खुलकर बोल चुके हैं, जिससे यह साफ होता है कि कांग्रेस में अंदरूनी एकजुटता फिलहाल कमजोर स्थिति में है.

हरीश रावत का 2017 की हार का बदला लेने वाला बयान एक तरह से अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश भी हो सकता है. लेकिन हरीश रावत के इस बयान के सामने आने के बाद फिर प्रदेश में 2016 के दल बादल की यादें ताजा हो गई हैं और कभी उनके साथ काम करने वाले नेता अब उनके खिलाफ एक बार फिर लामबंद होते हुए नजर आ रहे हैं. उधर कांग्रेस के भीतर भी हरीश रावत को लेकर आक्रोश कम नहीं है, पुरानी यादों के जरिए हरीश रावत पर अपने करीबियों को ही धोखा देने के रूप में उन्हें निशाने पर भी लिया जाने लगा है.

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