April 19, 2026

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चिपको आंदोलन की 52वीं वर्षगांठ: जंगल बचाने का अनूठा संघर्ष, सत्तर के दशक में जब देश में नहीं थे सख्त कानून

चिपको आंदोलन की 52वीं वर्षगांठ आज पूरे उत्तराखंड सहित देशभर में पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा के रूप में याद की जा रही है। यह आंदोलन न केवल जंगलों को बचाने की मिसाल बना, बल्कि आम लोगों, खासकर महिलाओं की शक्ति और जागरूकता का प्रतीक भी बनकर उभरा।

चमोली जिले के रैणी गांव से शुरू हुआ यह आंदोलन सत्तर के दशक में उस समय सामने आया, जब देश में वन संरक्षण को लेकर कड़े कानून मौजूद नहीं थे। उस दौर में बड़े पैमाने पर जंगलों की अंधाधुंध कटाई की जा रही थी, जिससे पर्यावरण संतुलन पर गंभीर खतरा मंडरा रहा था। ऐसे हालात में स्थानीय ग्रामीणों ने अपने जंगलों को बचाने के लिए अनोखा रास्ता अपनाया।

रैणी गांव की साहसी महिला गौरा देवी के नेतृत्व में गांव की महिलाओं ने पेड़ों से चिपककर उन्हें कटने से बचाया। जब ठेकेदारों की टीम पेड़ों की कटाई के लिए वहां पहुंची, तब महिलाओं ने बिना किसी डर के उनका सामना किया और पेड़ों को अपनी बाहों में भर लिया। उनका स्पष्ट संदेश था कि पहले उन्हें हटाया जाए, तभी पेड़ों को काटा जा सकेगा।

महिलाओं के इस शांतिपूर्ण लेकिन दृढ़ विरोध ने ठेकेदारों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। यही घटना आगे चलकर “चिपको आंदोलन” के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस आंदोलन ने न केवल उत्तराखंड बल्कि पूरे देश और दुनिया में पर्यावरण संरक्षण के प्रति नई सोच को जन्म दिया।

चिपको आंदोलन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें स्थानीय महिलाओं की भूमिका बेहद अहम रही। उन्होंने यह साबित किया कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। जल, जंगल और जमीन के संरक्षण का संदेश इस आंदोलन से व्यापक रूप से फैला।

इस आंदोलन के बाद सरकार और समाज दोनों स्तरों पर पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ी। वन संरक्षण से जुड़े कई नीतिगत बदलाव भी किए गए। चिपको आंदोलन को आज भी पर्यावरण संरक्षण के सफल और अहिंसक आंदोलनों में गिना जाता है।

आज, जब जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट जैसे मुद्दे गंभीर होते जा रहे हैं, ऐसे में चिपको आंदोलन की सीख और भी प्रासंगिक हो जाती है। यह हमें याद दिलाता है कि सामूहिक प्रयास और दृढ़ संकल्प से प्रकृति की रक्षा संभव है।

चिपको आंदोलन की 52वीं वर्षगांठ पर यह संकल्प लेना जरूरी है कि हम भी पर्यावरण संरक्षण में अपनी जिम्मेदारी निभाएं और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति को सुरक्षित रखें।

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